मुम्बई से फ्लाइट से गोरखपुर आता है ट्रेन का तत्काल टिकट


वातानुकूलित कोच में बैठकर गोरखपुर से बांद्रा की यात्रा कर रहे एक यात्री के टिकट ने चौंका दिया। टिकट तत्काल कोटे से बुक था। टिकट मुम्बई से बना था। गोरखपुर से मुंबई की यात्रा पूरी करने में 36 घंटे लगते हैं तो ट्रेन छूटने से महज एक दिन पहले आरक्षित तत्काल टिकट गोरखपुर कैसे पहुंच गया? इसका जवाब भी है। तत्काल टिकट बुक कराने और उसे पहुंचाने का एक रैकेट है। रैकेट में शामिल लोग मुंबई में तत्काल टिकट बुक कराते हैं और हवाई जहाज से जगह-जगह पहुंचाते हैं।

ऐसे होता है तत्काल का खेल

मुम्बई में पीआरएस (यात्री आरक्षण प्रणाली) 30 सेकेण्ड पहले ही खुल जाता है। वहां सक्रिय एजेंट मुम्बई और आसपास के सैकड़ों काउंटरों पर सुबह से ही जमे रहते हैं। तत्काल के लिए विंडो खुलते ही गोरखपुर से मुम्बई या अन्य सम्बंधित स्टेशनों से मुम्बई तक का टिकट बुक करा लेते हैं। आरक्षित टिकटों को फ्लाइट से लखनऊ भेज देते हैं। लखनऊ के उनके एजेंट सड़क मार्ग से अलग-अलग स्टेशनों पर जहां से डिमांड गई है वहां टिकट वितरित करते चले जाते हैं। उदाहरण के लिए अगर 12 मई को किसी यात्री को कुशीनगर एक्सप्रेस से मुम्बई तक यात्रा करनी है तो उसका टिकट 11 मई को मुम्बई में बुक हो जाएगा और उसी दिन फ्लाइट से लखनऊ और वहां सड़क मार्ग से यात्री के पास पहुंच जाएगा।

एक टिकट के एक से डेढ़ हजार

गोरखपुर, खलीलाबाद, बस्ती और गोण्डा से मुम्बई जाने वाले यात्रियों की तत्काल कोटे की टिकट मुम्बई से फ्लाइट से आती है। गोरखपुर से मुम्बई तक सक्रिय दलाल यात्री से तत्काल बर्थ के लिए 1000 से 1500 रुपये वसूलते हैं। गर्मी में गोरखपुर व आसपास के क्षेत्रों से रोजाना अलग ट्रेनों की 200 से 250 टिकट मुम्बई से बुक होकर आता है।

मुम्बई जाने वाली लगभग सभी ट्रेनों में खासकर स्लीपर क्लास में जो यात्री तत्काल टिकट पर यात्रा करते हैं उनमें से 50 फीसदी टिकट मुम्बई पीआरएस से बने होते हैं। चूंकि इन पर कार्रवाई का प्रावधान नहीं है इसलिए ये बच जाते हैं। ऐसे मामले पहले भी पकड़े जा चुके हैं।


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