भारतीय रेल का सच, यहां अंग्रेजों के ढर्रे पर गुजरती हैं हाईटेक ट्रेनें


एनकेजे (न्यू कटनी जंक्शन) से गुजरने वाली मेनलाइन को भारतीय रेलवे का गोल्डन ट्रैक कहा जाता है। गोल्डन ट्रैक यानी रेलवे को पर्याप्त मुनाफा देने वाली रेलवे लाइन। जानकर आश्चर्य होगा कि एनकेजे यार्ड से ट्रेनें आज भी अंग्रेजों के जमाने की व्यवस्था से गुजरती हैं। यहां से निकलने वाली सुपरफास्ट टे्रन, एक्सप्रेस, पैसेंजर व मालगाड़ी की पॉसिंग के लिए रेलवे के कर्मचारी हाथ से लीवर खींचते हैं। तब तय होता है कि ट्रेन किस पटरी से निकलेगी और फिर ट्रेन आगे बढ़ती है। पश्चिम मध्य रेलवे (जबलपुर) जोन के एनकेजे यार्ड से गुजरने वाली मेन रेलवे लाइन दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे (बिलासपुर) जोन के स्टेशनों को उत्तर भारत के शहरों से जोड़ती है। खासबात यह है कि 19 जनवरी 1961 को स्थापना के 56 साल बाद भी इस यार्ड को आधुनिकीकरण की दरकार है।

केबिन में काम करने वाले रेलवे कर्मचारी ने बताया कि जब रेलवे की शुरुआत हुई थी, तब ट्रेनों की पासिंग के लिए मैनुअल इंटरलाकिंग (हाथ से लीवर खींचकर पटरी को जोडऩे की व्यवस्था) सिस्टम प्रारंभ हुई थी। यार्ड बनने के 56 साल बाद भी एनकेजे यार्ड में आधुनिक तकनीक लागू नहीं होने से ट्रेनों की पॉसिंग के दौरान मानवीय चूक की आशंका बनी रहती है।
"ट्रेन की पॉसिंग में लगता है समय, यात्री होते हैं परेशान"
मैनुअल इंटरलॉकिंग सिस्टम का सबसे ज्यादा खामियाजा एनकेजे से गुजरने वाली ट्रेनों के यात्रियों को भुगतना पड़ रहा है। कटनी, कटनी साउथ या कटनी मुड़वारा से बिलासपुर, रायपुर व उस दिशा के दूसरे स्टेशनों तक जाने वाली ट्रेनों को कई बार एनकेजे पार करने में ही आधा घंटा व उससे भी ज्यादा समय लगना आम बात है। यात्रियों ने बताया कि रेलमंत्री सुरेश प्रभु कम से कम समय में ट्रेनों को गंतव्य स्टेशन तक पहुंचाने की बात कहते हैं। दूसरी ओर एनकेजे यार्ड से ट्रेन पॉसिंग में लगने वाले ज्यादा समय से यात्रियों की परेशानी पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। एनकेजे यार्ड में ट्रेनों की पॉसिंग मैनुअली सिस्टम से हो रही है। आधुनिकीकरण की प्रक्रिया चल रही है। 6 केबिन के बीच दो आरआरआई (रुट रिले इंटरलॉकिंग) केबिन स्थॉपित होगा। इसमें एक साल से ज्यादा का समय लग सकता है।
- एपी तिवारी, एरिया मैनेजर, एनकेजे

Courtsey: Patrika

ALSO READ :-

No comments:

People

Powered by Blogger.